मानने से जानने तक’ के सफर पर निकले ॐ आचार्या, पैदल यात्रा के जरिए समझ रहे समाज और जीवन

Chandrakant Pargir


 बैकुंठपुर। बिहार के सीतामढ़ी से ॐ आचार्या एक अनोखे संकल्प के साथ लंबी पैदल यात्रा पर निकले हैं। उनकी यात्रा का उद्देश्य केवल विभिन्न स्थानों तक पहुंचना नहीं, बल्कि समाज, लोगों और जीवन को करीब से समझना है। ‘The Journey from Believing to Knowing’ यानी ‘मानने से जानने तक का सफर’ उनके इस अभियान की मूल सोच है।


ॐ आचार्या ने अपनी यात्रा की शुरुआत सीतामढ़ी, बिहार से की। यात्रा के दौरान उन्होंने जानकी स्थान, पुनौरा धाम और जनकपुर सहित कई धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण किया। इसके बाद छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों से होते हुए अब वे मध्यप्रदेश की ओर बढ़ रहे हैं। आगे उनकी यात्रा अमरकंटक तक जाने की है।




ॐ आचार्या बताते हैं कि इस यात्रा के दौरान वे प्रतिदिन करीब 40 से 50 किलोमीटर तक पैदल चलने का प्रयास करते हैं। हालांकि रास्ते में मिलने वाले लोगों से बातचीत और उनका सहयोग मिलने पर यात्रा का कार्यक्रम बदलता रहता है। सीमित सामान के साथ वे लगातार आगे बढ़ रहे हैं।

उनके अनुसार, इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य लोगों की समस्याओं और जीवन के संघर्षों को करीब से समझना है। उनका कहना है कि समाज में कई बातें ऐसी हैं, जिन्हें लोग बिना जांचे-परखे सिर्फ इसलिए सच मान लेते हैं क्योंकि उन्हें परिवार या समाज से ऐसा सुनने को मिला होता है। उनका संदेश है कि ‘मानने’ के बजाय ‘जानने’ की कोशिश करनी चाहिए।




यात्रा के दौरान लोगों से मिल रहे अनुभवों को साझा करते हुए ॐ आचार्या कहते हैं कि दूर से देखने पर दुनिया कई बार बहुत कठिन और खराब नजर आती है, लेकिन जब व्यक्ति खुद निकलकर लोगों से मिलता है तो उसे दुनिया की खूबसूरती और लोगों के भीतर मौजूद संवेदनशीलता का एहसास होता है। उनके मुताबिक यात्रा व्यक्ति को अपनी सोच और पूर्वाग्रहों से बाहर निकलने का अवसर देती है।


उन्होंने सेवा और रिश्तों को लेकर भी अपनी सोच साझा की। उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति के पास धन, क्षमता या शक्ति है और वह जरूरतमंद व्यक्ति की मदद नहीं करता, तो उस क्षमता का क्या अर्थ है। यदि सक्षम व्यक्ति एक संघर्ष कर रहे व्यक्ति का हाथ थाम ले, तो इससे पूरे समाज को मजबूती मिल सकती है।


ॐ आचार्या का कहना है कि श्रीमद्भगवद्गीता का ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ जीवन में कर्म करते रहने की प्रेरणा देता है। उनके लिए यह यात्रा भी इसी भावना का हिस्सा है—बिना परिणाम की चिंता किए लोगों को समझना, सीखना और जहां संभव हो, वहां सेवा करना।


उन्होंने बताया कि यात्रा शुरू करने से पहले माता-पिता की सहमति ली गई। परिवार का कहना था कि नौकरी करते हुए भी सेवा की जा सकती है, लेकिन उनके भीतर समाज और जीवन को प्रत्यक्ष रूप से समझने की इच्छा काफी समय से थी। इसी सोच के साथ उन्होंने यह यात्रा शुरू की।


ॐ आचार्या के लिए यह केवल पैदल यात्रा नहीं, बल्कि सोच को बदलने और जीवन को समझने का प्रयास है। उनका संदेश है—हर बात को सिर्फ इसलिए न मानें कि किसी ने उसे बताया है; सवाल करें, जानने की कोशिश करें और अनुभव के आधार पर अपनी समझ बनाएं।

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