मंगल राइस मिल धान घोटाला: एफआईआर और तीन साल की ब्लैकलिस्टिंग के बाद भी कई सवाल अनुत्तरित, 64 हजार क्विंटल से अधिक चावल बकाया होने का रिकॉर्ड, मिल में सत्यापन के दौरान नहीं मिला धान-चावल का स्टॉक; खरीदी व्यवस्था से जुड़े जिम्मेदारों की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल

Chandrakant Pargir


  

बैकुंठपुर (कोरिया)। जिले के पटना स्थित चितमारपारा स्थित मेसर्स मंगल राइस मिल से जुड़े धान-चावल की कथित अफरा-तफरी का मामला अब भी कई अनुत्तरित सवालों के साथ चर्चा में है। इस मामले में प्रशासन ने अक्टूबर 2024 में एफआईआर दर्ज कराने, मिल को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट करने और अमानत राशि की वसूली की कार्रवाई की घोषणा की थी। इसके बावजूद पूरे प्रकरण में धान खरीदी केंद्रों से लेकर मिल तक धान पहुंचाने, परिवहन रिकॉर्ड तैयार करने, मिलिंग अनुबंध स्वीकृत करने और भौतिक सत्यापन करने वाले जिम्मेदारों की भूमिका को लेकर सवाल बने हुए हैं। तत्कालीन जिला प्रशासन ने ऐसे सवालों को नज़र अंदाज़ कर दिया था।


मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार मिल को 64,320 क्विंटल चावल जमा करना था, लेकिन 1 नवंबर 2023 तक महज 289.8 क्विंटल चावल जमा होना दर्ज था। इस हिसाब से 64,030.2 क्विंटल चावल जमा होना शेष था। दूसरी ओर, प्रशासन द्वारा कराए गए भौतिक सत्यापन में मिल परिसर में धान और चावल का कोई स्टॉक नहीं मिला। मिल संचालिका की ओर से भी निर्धारित मात्रा में चावल जमा नहीं करने के संबंध में संतोषजनक जवाब और संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जाने की जानकारी सामने आई थी। 


एफआईआर और ब्लैकलिस्टिंग हुई, लेकिन जांच का दायरा कितना बढ़ा?

1 अक्टूबर 2024 को सामने आई प्रशासनिक कार्रवाई के मुताबिक कलेक्टर के निर्देश पर गठित जिला स्तरीय जांच दल ने मिल का भौतिक सत्यापन किया था। सत्यापन में धान और चावल का स्टॉक नहीं मिलने तथा निर्धारित चावल जमा नहीं किए जाने के आधार पर मिल संचालिका के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की कार्रवाई की गई। साथ ही मिल को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट करने और अमानत राशि वसूलने की कार्रवाई की जानकारी दी गई।

लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या कार्रवाई केवल मिल संचालिका और मिल तक सीमित रही? धान का उठाव जिन खरीदी केंद्रों से दर्शाया गया, उन केंद्रों के प्रबंधकों, कंप्यूटर ऑपरेटरों, परिवहनकर्ताओं और डीओ जारी करने की प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की जवाबदेही किस स्तर तक तय हुई? क्या धान के परिवहन में उपयोग किए गए वाहनों के नंबर, तौल पर्चियां, गेट पास और मिल पहुंचने के रिकॉर्ड का मिलान कराया गया? यदि जांच हुई तो उसका निष्कर्ष सार्वजनिक क्यों नहीं हुआ?


बंद मिल के नाम पर धान का उठाव कैसे हुआ?

इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब मिल लंबे समय से बंद बताई जा रही थी, तब उसके नाम पर हजारों क्विंटल धान का उठाव कैसे दर्शाया गया? धान खरीदी केंद्र से मिल तक धान पहुंचाने के लिए डीओ जारी होने के बाद परिवहन, वाहन की उपलब्धता, तौल और मिल में स्टॉक की पुष्टि जैसी कई प्रक्रियाएं होती हैं। ऐसे में यह केवल किसी एक कर्मचारी की चूक थी या पूरी व्यवस्था में कहीं गंभीर खामी थी, इसकी जांच जरूरी है।

मामले में वर्ष 2018-19 के रिकॉर्ड से लेकर खरीफ विपणन वर्ष 2023-24 के अनुबंध और चावल जमा करने की स्थिति तक सभी दस्तावेजों का मिलान किए जाने की जरूरत है। खासकर यह जांच महत्वपूर्ण है कि पूर्व वर्षों की बकाया मिलिंग और चावल जमा नहीं होने की स्थिति में वर्ष 2023-24 के लिए मिलिंग अनुबंध किस आधार पर स्वीकृत किया गया।


पटना और गिरजापुर समितियों के आंकड़े भी जांच के दायरे में

धान खरीदी के पुराने आंकड़े भी कई सवाल खड़े करते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पटना समिति में 1,34,352 क्विंटल और गिरजापुर समिति में 95,382 क्विंटल धान की खरीदी दर्ज की गई थी। इन दोनों केंद्रों में शून्य सूखती दर्ज होने की बात सामने आई थी, जबकि जिले के अन्य खरीदी केंद्रों में हजारों क्विंटल धान की सूखती दर्ज की गई थी।

इतनी बड़ी मात्रा में धान खरीदी के बावजूद सूखती शून्य दर्ज होना अपने आप में जांच का विषय है। क्या दोनों समितियों में वास्तविक तौल, नमी परीक्षण और ऑनलाइन प्रविष्टियों का नियमानुसार सत्यापन हुआ था? क्या संबंधित रिकॉर्ड और भौतिक स्टॉक का मिलान कराया गया? इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आ सकता है।


जिन पर सवाल, उन्हीं को फिर जिम्मेदारी मिलने के आरोप

स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी लगाए जाते रहे हैं कि बंद राइस मिल के नाम पर धान उठाव के मामले में जिन समिति कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध बताई गई थी, उन्हें बाद में फिर से पटना धान खरीदी केंद्र की जिम्मेदारी से जुड़े कार्यों में देखा गया। कुछ लोगों का दावा है कि ऐसे कर्मचारियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खरीदी व्यवस्था में काम करने का अवसर मिलता रहा।

हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित कर्मचारियों की भूमिका पर आधिकारिक जांच रिपोर्ट सामने आना जरूरी है। प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि एफआईआर में नामजद या जांच के दायरे में आए किसी कर्मचारी को खरीदी व्यवस्था में जिम्मेदारी दी गई है या नहीं। यदि दी गई है तो किस आदेश और किस आधार पर?


 इन सवालों के जवाब की दरकार

मंगल राइस मिल प्रकरण में अब केवल एफआईआर और ब्लैकलिस्टिंग की जानकारी पर्याप्त नहीं है। यह भी सामने आना चाहिए कि पुलिस विवेचना कहां तक पहुंची, अमानत राशि की वसूली हुई या नहीं, शासन को हुए नुकसान का आकलन कितना है और उसकी भरपाई के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

साथ ही धान खरीदी केंद्रों से मिल तक धान पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों-कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय हुई या नहीं, इसकी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए। आगामी धान खरीदी व्यवस्था में पुराने विवादों से जुड़े कर्मचारियों की तैनाती को लेकर भी प्रशासन को पारदर्शी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।


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