बैकुंठपुर। दिसंबर 2026 में प्रस्तावित बैकुंठपुर नगर पालिका चुनाव को लेकर अभी औपचारिक चुनावी प्रक्रिया शुरू होने में समय है, लेकिन शहर की सियासत में हलचल तेज हो गई है। नगर पालिका अध्यक्ष की सीट सामान्य होने के बाद संभावित दावेदारों की सूची दिन-ब-दिन लंबी होती जा रही है। चौक-चौराहों से लेकर राजनीतिक और सामाजिक बैठकों तक अब एक ही चर्चा है—भाजपा आखिर किस चेहरे पर दांव लगाएगी?
सामान्य सीट होने का असर यह है कि इस बार दावेदारी का दायरा पहले की तुलना में काफी व्यापक दिखाई दे रहा है। शहर में अपेक्षाकृत कम समय पहले आए कुछ लोगों के नाम भी चर्चाओं में हैं। वहीं सामाजिक और धार्मिक संगठनों से जुड़े कुछ लोग भी संभावित दावेदारों के रूप में अपनी सक्रियता बढ़ाते नजर आ रहे हैं। इनमें ऐसे लोग भी हैं जिनका कारोबार सरकारी विभागों में सप्लाई से जुड़ा है। हालांकि किसकी दावेदारी वास्तव में गंभीर है और कौन केवल राजनीतिक माहौल भांप रहा है, इसका फैसला आने वाले समय में ही होगा।
भाजपा के संभावित चेहरों में पहले से शैलेश शिवहरे, भानु पाल, अनिल खटीक, शारदा प्रसाद गुप्ता, पंकज गुप्ता और सीए प्रशांत गुप्ता जैसे नाम चर्चा में हैं। इनके अलावा अब कुछ ऐसे नाम भी सामने आ रहे हैं, जिनकी अपनी सामाजिक, पेशेवर और व्यक्तिगत पहचान है।
आशीष गुप्ता—कानून की समझ और संभ्रांत पारिवारिक पृष्ठभूमि
वरिष्ठ अधिवक्ता आशीष गुप्ता का नाम भी संभावित दावेदारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। शहर के प्रतिष्ठित परिवार से आने वाले आशीष गुप्ता लंबे समय से अधिवक्ता के रूप में सक्रिय हैं। भाजपा के अधिवक्ता प्रकोष्ठ से उनका पुराना जुड़ाव रहा है। बुद्धिजीवी वर्ग में उनकी पहचान सहज और साफ छवि वाले व्यक्ति के रूप में बताई जाती है। समर्थकों की नजर में उनकी कानूनी समझ और सामाजिक स्वीकार्यता उन्हें दूसरे दावेदारों से अलग करती है।
संजय जायसवाल—तीन बार के पार्षद, नगर पालिका की राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी
संजय जायसवाल नगर की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय चेहरा हैं। कम उम्र में पार्षद बनने के बाद लगातार तीसरी बार पार्षद निर्वाचित हुए। नगर पालिका के भीतर हो या बाहर, शहर और आमजन से जुड़े मुद्दों पर मुखर रहने के कारण उनकी अलग पहचान है। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे भी राजनीतिक चर्चा में रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि राजनीतिक परिस्थितियां चाहे जैसी रही हों, उन्होंने गलत को गलत कहने में संकोच नहीं किया। कांग्रेस से अलग होने के बाद उनकी अगली राजनीतिक भूमिका पर भी नजरें हैं। नगर पालिका की कार्यप्रणाली और अंदरूनी रणनीति की उनकी समझ को उनकी बड़ी ताकत माना जाता है।
राजेन्द्र सिंह ‘दद्दा’—कर्मचारी संगठन से सामाजिक सरोकार तक मजबूत पकड़
राजेन्द्र सिंह ‘दद्दा’ का नाम भी संभावित दावेदारों में सामने आया है। अधिकारी-कर्मचारी फेडरेशन में अध्यक्ष से लेकर विभिन्न जिम्मेदारियों पर रहे राजेन्द्र सिंह का कर्मचारी वर्ग में लंबा संपर्क रहा है। राजपूत समाज के साथ-साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और खेल संगठनों में भी उनकी सक्रियता रही है। कलाकारों और खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए भी वे जाने जाते हैं। हाल ही में सेवानिवृत्त हुए राजेन्द्र सिंह शहर के विकास को लेकर अपना रोडमैप रखने की बात करते हैं। उनकी निर्विवाद सामाजिक छवि को समर्थक उनकी बड़ी पूंजी मानते हैं।
अनुराग दुबे ‘अन्नू’—जनहित के मुद्दों पर मुखर, संगठन में संपर्क
अनुराग दुबे ‘अन्नू’ भी इन दिनों संभावित दावेदारों की चर्चा में हैं। गौसेवा से जुड़े रहने के साथ वे जनहित के मुद्दों पर मुखर रहने के लिए जाने जाते हैं। नगर पालिका के कामकाज पर नजर रखने और स्थानीय मुद्दों को उठाने में उनकी सक्रियता दिखाई देती है। राजनीतिक हलकों में उन्हें भाजपा समर्थक माना जाता है। विधायक के करीबी तथा वर्तमान और पूर्व नगर पालिका अध्यक्षों से उनके अच्छे संबंध होने की चर्चा भी राजनीतिक गलियारों में होती रही है। हालांकि अंतिम तौर पर उनकी दावेदारी कितनी गंभीर होती है, यह पार्टी स्तर पर निर्णय के बाद स्पष्ट होगा।
आस्तिक शुक्ला ‘लड्डू’—व्यवसायी और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय चेहरा
आस्तिक शुक्ला ‘लड्डू’ का नाम समर्थकों की ओर से संभावित दावेदार के तौर पर आगे बढ़ाया जा रहा है। पारिवारिक रूप से कांग्रेस से जुड़ी पृष्ठभूमि होने के बावजूद वे शहर के प्रतिष्ठित व्यवसायी और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय व्यक्ति के रूप में पहचाने जाते हैं। मृदुभाषी स्वभाव और सामाजिक कार्यों में सहयोग के कारण उनका अपना संपर्क क्षेत्र है। खास बात यह है कि अभी तक उनकी ओर से स्वयं कोई औपचारिक दावेदारी सामने नहीं आई है, लेकिन समर्थक उन्हें अध्यक्ष पद के लिए उपयुक्त चेहरा मान रहे हैं।
सुरेंद्र सिंह ‘छोटू’—जमीनी कार्यकर्ता और ग्रामीण क्षेत्रों में पकड़
सुरेंद्र सिंह ‘छोटू’ भी भाजपा से अपनी दावेदारी सामने रखने की इच्छा रखते हैं। चुनावी समय में भाजपा के लिए सक्रिय रहने वाले सुरेंद्र सिंह की ग्रामीण इलाकों में सामाजिक पकड़ बताई जाती है। वे लंबे समय से सामाजिक गतिविधियों से जुड़े हैं और रक्तदान तथा अस्पताल में मरीजों की सहायता जैसे कार्यों में सक्रिय रहे हैं। समर्थकों का मानना है कि जमीनी स्तर पर उनकी सक्रियता और ग्रामीण संपर्क नगर पालिका चुनाव में उपयोगी साबित हो सकता है।
प्रियांशु जायसवाल—युवा, शिक्षित और राजनीति से अलग पृष्ठभूमि
युवा चेहरों में प्रियांशु जायसवाल का नाम भी तेजी से चर्चा में आया है। प्रतिष्ठित व्यवसायी परिवार से आने वाले प्रियांशु स्वयं भी व्यवसाय से जुड़े हैं। शिक्षित, सरल और सौम्य छवि के इस युवा चेहरे का कोई बड़ा राजनीतिक बैकग्राउंड नहीं है। किसी राजनीतिक दल से प्रत्यक्ष जुड़ाव नहीं होने के कारण समर्थक उन्हें नई पीढ़ी और नई सोच के प्रतिनिधि के रूप में पेश कर रहे हैं। यदि पार्टी इस बार अपेक्षाकृत नए चेहरे पर दांव लगाने का फैसला करती है तो उनकी दावेदारी पर भी नजर रहेगी। बताया जा रहा है कांग्रेस से दावेदारी कर सकते है।
राहुल खस—संगठन में संपर्क और बड़े नेताओं तक पहुंच का दावा
राहुल खस भी खुलकर अपनी दावेदारी को लेकर चर्चा में हैं। भाजपा में रायपुर से लेकर दिल्ली तक संगठनात्मक संपर्क होने का दावा करने वाले राहुल खस पूर्व में सांसद पद की संभावित दावेदारी को लेकर भी चर्चा में रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी सहित वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात कर क्षेत्र के विकास के मुद्दे उठाने की बात उनके समर्थक करते हैं। अब वे शहर के विकास में योगदान देने की इच्छा के साथ नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए अपनी दावेदारी को आगे बढ़ा रहे हैं।
सवाल सिर्फ दावेदारी का नहीं, ‘जीतने वाले चेहरे’ का
बैकुंठपुर में भाजपा और कांग्रेस के सामने इस बार केवल दावेदारों की संख्या ही चुनौती नहीं होगी, बल्कि ऐसा चेहरा चुनना बड़ी चुनौती होगी जो संगठन, सामाजिक समीकरण, व्यक्तिगत स्वीकार्यता और चुनावी जीत—चारों कसौटियों पर खरा उतरे।
एक तरफ लंबे समय से राजनीति में सक्रिय चेहरे हैं तो दूसरी ओर अधिवक्ता, कर्मचारी नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, व्यवसायी और युवा चेहरे भी अपनी-अपनी खूबियों के साथ चर्चा में हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में दावेदारों की सक्रियता और बढ़ने की संभावना है।
अभी प्रत्याशी चयन में समय है, लेकिन बैकुंठपुर की सामान्य सीट ने शहर की राजनीति में नए समीकरणों की जमीन तैयार कर दी है। अब देखना यह होगा कि पार्टी अनुभव को प्राथमिकता देती है, संगठनात्मक पकड़ को, सामाजिक स्वीकार्यता को या फिर किसी नए चेहरे के जरिए शहर में नई राजनीतिक पारी शुरू करने का फैसला करती है।


