कोरिया। जलसंरक्षण को लेकर प्रशासन और सरकारी दावों के बीच अब जमीनी हकीकत को लेकर सवाल उठने लगे हैं। प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ कार्यक्रम में कोरिया जिले के लगभग 1200 किसानों द्वारा खेतों में गड्ढे खोदकर जलस्तर बढ़ाने का उल्लेख किया गया था, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों से सामने आ रही स्थिति इन दावों पर नई बहस खड़ी कर रही है।
ग्रामीणों और किसानों का कहना है कि जिस अवधि में गड्ढे खोदे जाने की बात कही गई, उस दौरान जिले में ठंड का मौसम था और अप्रैल तक पर्याप्त बारिश नहीं हुई। ऐसे में बिना बारिश के खेतों में जलस्तर बढ़ने के दावों को लेकर लोग सवाल उठा रहे हैं। किसानों का तर्क है कि भूजल स्तर में सुधार सामान्यतः लंबे समय तक पानी के संचयन और वर्षा पर निर्भर करता है।
‘मन की बात’ में चर्चा के बाद कई ग्रामीण इलाकों में खेतों के किनारे गड्ढे खोदने को लेकर दबाव बढ़ने की भी बातें सामने आ रही हैं। कुछ गड्ढे जो खोदे भी उनपर भी हल चलने लगे है। प्रशासनिक स्तर पर इसे जलसंरक्षण का प्रभावी मॉडल बताया गया, लेकिन किसानों का कहना है कि खेतों में खेती की तैयारी शुरू होते ही इन गड्ढों का सुरक्षित बच पाना मुश्किल होगा। धान प्रधान क्षेत्र होने के कारण किसान अपनी जमीन का एक-एक हिस्सा खेती में उपयोग करते हैं और खेतों की जुताई पूरे क्षेत्र में की जाती है। कई बार सीमावर्ती खेतों तक हल चलने के कारण ऐसे गड्ढों पर भी हल चलाकर फसल की बुआई कर दी जाएगी।
ग्रामीणों के बीच अब यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि खेतों में जलसंरक्षण के लिए गड्ढे बनाए गए हैं तो क्या प्रशासन उनकी सुरक्षा और स्थायित्व के लिए कोई व्यवस्था करेगा। किसानों का कहना है कि केवल गड्ढे खोद देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें संरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है, अन्यथा कुछ महीनों में उनका अस्तित्व खत्म हो सकता है।
बताया जा रहा है कि इस मॉडल को देश भर में व्यापक स्तर पर लागू करने की बात कही गई है, बताया गया कि देश भर में लागू होगा लेकिन पड़ोसी जिलों एमसीबी और सूरजपुर में अब तक इस तरह का कोई व्यापक अभियान शुरू नहीं होने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में कोरिया जिले में चल रहे इस मॉडल की व्यवहारिकता और दीर्घकालिक प्रभाव को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

