स्थानीय प्रतिभाओं की उपेक्षा से सवालों में साहित्यिक आयोजन, कोरिया के कवि-लेखकों को मंच कब?

Chandrakant Pargir

 


बैकुंठपुर। 22 मई 2026। कोरिया जिले में बीते कुछ वर्षों से साहित्य और संस्कृति के नाम पर आयोजित हो रहे महोत्सवों में स्थानीय कवियों, लेखकों और कलाकारों की लगातार उपेक्षा को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। जिले के साहित्य प्रेमियों और बुद्धिजीवियों का कहना है कि कोरिया की धरती प्रतिभाओं से समृद्ध होने के बावजूद आयोजनों में बाहर से आए कलाकारों को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि स्थानीय साहित्यकारों को मंच तक नहीं मिल पाता।


कोरिया में होने वाले साहित्यिक आयोजनों में रायपुर से लेकर इंदौर और अन्य शहरों के कवि, शायर, गायक और कलाकारों को आमंत्रित किया जाता है, लेकिन स्थानीय प्रतिभाओं की उपस्थिति नगण्य दिखाई देती है। इससे साहित्यिक वातावरण में असंतोष की स्थिति बन रही है।


जिले के वरिष्ठ साहित्यकार भोला प्रसाद मिश्र “अनाम” सरगुजिहा हास्य कविताओं के लिए जाने जाते हैं। वे एक अच्छे गायक भी हैं और गिटार के साथ अपनी प्रस्तुतियों से अलग पहचान रखते हैं। वहीं गीता प्रसाद नेमा ने साहित्य की लगभग हर विधा में लेखन किया है। उनकी देशभक्ति और सामाजिक व्यवस्था पर आधारित कविताएं प्रभावशाली मानी जाती हैं।


देखने मे छोटा लगने वाले इस कलाकार ने देश विदेश में कोरिया के नाम रौशन किया, ओम अग्रहरि आज गायकी की दुनिया मे बड़ा नाम बनकर उभर रहे है। विदेशों में भी इस कलाकार ने कई कार्यक्रम दिए है।

कहानीकार नेसार नाज़ का नाम भी जिले के साहित्यिक जगत में प्रमुखता से लिया जाता है। उनकी चर्चित कृति “हांफता हुआ शोर” की कहानियों को पाठक मुंशी प्रेमचंद की शैली की याद दिलाने वाली बताते हैं। साहित्यकारों का कहना है कि नेसार नाज़ को अपेक्षित सम्मान नहीं मिला, हालांकि कुछ साहित्यकारों ने समय-समय पर उन्हें मंच और सम्मान देने का प्रयास किया है। उनकी पुस्तक का विमोचन रायपुर में साहित्यकार संजय अलंग द्वारा कराया गया था। इतना ही नहीं, प्रसिद्ध गायक जोड़ी अहमद हुसैन–मोहम्मद हुसैन के साथ भी उन्होंने समय बिताया और बाद में “नेसार” नाम से एक एल्बम भी रिलीज किया गया।


गजल की दुनिया में शैलेंद्र श्रीवास्तव, ताहिर आज़मी, पद्मनाभ गौतम और विजय सोनी “शान” जैसे नाम राष्ट्रीय स्तर तक कोरिया की पहचान बना चुके हैं। उनकी लिखी कई गजलों को मुंबई सहित बड़े शहरों के नामचीन गायकों और संगीतकारों ने स्वर दिए हैं।


बैकुंठपुर के प्रसिद्ध सुर्वे परिवार से जुड़े युवा संगीतकार शुभांक सुर्वे भी स्थानीय आयोजनों में उपेक्षा के शिकार रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी उनका दर्द कई बार सामने आ चुका है। साहित्य और संगीत जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि जिले में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, आवश्यकता केवल उन्हें उचित मंच देने की है।


युवा साहित्यकार संवर्त कुमार रूप का नाम भी जिले में तेजी से उभरा है। उन्हें साहित्य के क्षेत्र में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं। वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड लंदन, गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड जैसे मंचों पर उन्हें अलंकृत किया जा चुका है। उनकी पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। खास बात यह है कि वे स्वयं स्थानीय साहित्यकारों के सम्मान समारोह आयोजित करते रहे हैं, लेकिन बड़े आयोजनों में उनकी भी उपस्थिति सीमित दिखाई देती है।


जानी-मानी लेखिका अनीता चौहान, विजय सोनी, ताहिर आज़मी, राजेंद्र सिंह “दद्दा”, शुभांक सुर्वे सहित जिले के कई वरिष्ठ साहित्यकार और कलाकार वर्षों से अपनी रचनात्मक पहचान बनाए हुए हैं। बावजूद इसके, साहित्यिक आयोजनों में स्थानीय प्रतिभाओं की अनदेखी लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है।



साहित्य प्रेमियों का मानना है कि यदि स्थानीय प्रतिभाओं को मंच और सम्मान मिलेगा, तभी कोरिया की साहित्यिक पहचान और अधिक मजबूत होगी। अब देखने वाली बात यह होगी कि आने वाले आयोजनों में स्थानीय रचनाकारों को कितना स्थान मिलता है।

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!