जनकपुर के मवई नदी में धड़ल्ले से अवैध रेत उत्खनन, एनजीटी नियमों की खुलेआम अनदेखी

Chandrakant Pargir

 


 

एमसीबी/जनकपुर। एमसीबी जिले के जनकपुर क्षेत्र अंतर्गत राम वन गमन पथ हरचौका स्थित मवई नदी में अवैध रेत उत्खनन का कारोबार बेरोकटोक जारी है। दिन-रात बड़ी-बड़ी मशीनों के जरिए नदी से रेत निकाली जा रही है, जिससे न सिर्फ पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के नियमों की भी खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

जानकारी के अनुसार राम वन गमन पथ हरचौका मंदिर से कुछ ही दूरी पर भारी मशीनें नदी के भीतर उतार दी गई हैं। नियमों के मुताबिक नदी के भीतर मशीनों से उत्खनन, धार्मिक स्थलों के समीप खनन और रात्रिकालीन उत्खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है, इसके बावजूद यहां खुलेआम नियमों की अनदेखी की जा रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि खनिज विभाग की मौन स्वीकृति से यह अवैध गतिविधि फल-फूल रही है।


सत्ता बदली, पर रेत का खेल जारी

स्थानीय लोगों और जानकारों के अनुसार वर्ष 2017 में इस क्षेत्र में पहली बार अवैध रेत उत्खनन शुरू हुआ था। उस समय भाजपा की सरकार थी और कांग्रेस नेताओं ने इसका जमकर विरोध कर इसे बड़ा मुद्दा बनाया था। वर्ष 2018 में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद न केवल उत्खनन रुका, बल्कि और अधिक संगठित तरीके से रेत का अवैध कारोबार शुरू हो गया। तब भाजपा नेताओं ने विरोध प्रदर्शन किए और विधानसभा चुनाव के दौरान रेत उत्खनन बंद कराने का वादा किया गया।

अब भाजपा की सरकार बनने के बावजूद मवई नदी में बड़े स्तर पर अवैध रेत उत्खनन जारी है। इससे साफ है कि सरकारें बदलीं, पर रेत माफियाओं पर कार्रवाई के दावे केवल कागजों तक ही सीमित रह गए।


पर्यावरण और आस्था दोनों पर संकट

मवई नदी राम वन गमन पथ से जुड़ी होने के कारण धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। अवैध उत्खनन से नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हो रहा है, जलस्तर गिर रहा है और आसपास के गांवों में भू-क्षरण का खतरा बढ़ गया है। वहीं धार्मिक स्थल के समीप हो रहे खनन से श्रद्धालुओं की आस्था को भी ठेस पहुंच रही है।


कार्रवाई की मांग

स्थानीय ग्रामीणों ने प्रशासन और राज्य शासन से अवैध रेत उत्खनन पर तत्काल रोक लगाने, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करने और नदी क्षेत्र की नियमित निगरानी की मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि जल्द सख्त कदम नहीं उठाए गए तो मवई नदी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

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