मनेन्द्रगढ़ वन मंडल बना सरकार की सबसे बड़ी किरकिरी, शहर में वन्यजीव और दफ़्तर में सवाल

Chandrakant Pargir

 


मनेन्द्रगढ़ (एमसीबी)।

एमसीबी जिले का मनेन्द्रगढ़ वन मंडल इन दिनों पूरे प्रदेश में चर्चा का नहीं, बल्कि चिंता और विवाद का विषय बन चुका है। एक ओर जंगल से निकलकर वन्यजीव लगातार शहर की सीमाओं में प्रवेश कर रहे हैं, जिससे आम नागरिकों में भय का माहौल है, वहीं दूसरी ओर वन मंडलाधिकारी (डीएफओ) की कार्यशैली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि मनेन्द्रगढ़ वन मंडल अब राज्य सरकार के लिए सबसे बड़ी किरकिरी का कारण बनता नजर आ रहा है।


भाजपा सरकार के गठन के बाद यदि किसी एक विभाग ने सबसे अधिक राजनीतिक असहजता पैदा की है, तो वह मनेन्द्रगढ़ वन मंडल है। शुरुआत भाजपा के ही स्थानीय पदाधिकारियों द्वारा डीएफओ के खिलाफ मोर्चा खोलने से हुई थी। उस समय ऐसा लगा था कि सरकार जल्द कोई ठोस कार्रवाई कर सकती है, लेकिन यह उम्मीद ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी। भाजपा के विरोध के बाद कांग्रेस ने बड़े स्तर पर आंदोलन छेड़ दिया और इसके बाद हालात पूरी तरह बदलते नजर आए। अब स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम हो गई है कि डीएफओ को राज्य सरकार का संरक्षण प्राप्त हो गया है और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई संभव नहीं रह गई है।



सूत्रों के अनुसार डीएफओ इस समय महुआ संरक्षण से जुड़े मामलों में बुरी तरह उलझे हुए हैं और माना जा रहा है कि भविष्य में इन मामलों में कार्रवाई की नौबत आ सकती है। शायद यही वजह है कि अपने पूरे कार्यकाल से संबंधित किसी भी प्रकार की जानकारी को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है। जानकारों का कहना है कि जब किसी अधिकारी के कामकाज पर सवाल खड़े होते हैं, तो पारदर्शिता से दूरी अपने आप शक को और गहरा कर देती है।



मामला सिर्फ प्रशासनिक विवाद तक सीमित नहीं है। सरकारी नियमों के विपरीत आदेश जारी करने के मामलों में प्रकरण हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है, जहां डीएफओ के खिलाफ अवमानना से जुड़ा मामला लंबित बताया जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में उन्हें माननीय न्यायालय के समक्ष माफी मांगनी पड़ सकती है और यह भी संभव है कि अदालत इस मामले में कोई सख्त रुख अपनाए। ऐसे में वन मंडल की कार्यप्रणाली पर न्यायिक नजर भी टिक चुकी है।


इसी बीच डीएफओ द्वारा विभिन्न परिक्षेत्रों में मनमर्जी से की गई नियुक्तियां भी विवाद का कारण बनीं। कुंवरपुर परिक्षेत्र में भूपेंद्र यादव को डिप्टी, केल्हारी में रघुराज सिंह को डिप्टी और खड़गवां में शंखमुनि पांडेय की नियुक्ति की गई थी। बढ़ते विवाद और सवालों के बाद सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा और अंततः इन पदों पर प्रशिक्षु अधिकारियों की नियुक्ति करनी पड़ी। यह घटनाक्रम खुद इस बात का संकेत माना जा रहा है कि प्रशासनिक स्तर पर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था।


सबसे गंभीर और भयावह स्थिति मनेन्द्रगढ़ परिक्षेत्र की बताई जा रही है। यहां कांग्रेस शासनकाल से पदस्थ रेंजर के कार्यकाल में अतिक्रमण के सबसे अधिक मामले सामने आए हैं। लगातार अतिक्रमण के कारण जंगल सिमटते चले गए और इसका सीधा असर यह हुआ कि वन्यजीवों की आवाजाही शहर तक पहुंच गई। हालात यह हैं कि सुबह और शाम के समय लोग घर से निकलने में डर महसूस कर रहे हैं और शहर में आक्रोश का माहौल बन गया है।


स्थानीय लोगों का आरोप है कि मनेन्द्रगढ़ परिक्षेत्र में केवल अतिक्रमण ही नहीं, बल्कि अडानी के प्लांटेशन कार्य, कैम्पा मद से चौकीदारों को मिलने वाली राशि में हेरफेर और ऐसे दर्जनों मामलों में भ्रष्टाचार की चर्चाएं आम हैं। इन आरोपों के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई न होना प्रशासनिक कार्यशैली और राजनीतिक संरक्षण दोनों पर सवाल खड़े करता है।


इन तमाम परिस्थितियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि राज्य सरकार आखिर किसके साथ खड़ी है—एक विवादों में घिरे अधिकारी के साथ या फिर वन्यजीवों से जूझ रहे और दहशत में जी रहे आम नागरिकों के साथ। मनेन्द्रगढ़ वन मंडल में फैली अव्यवस्था ने यह साफ कर दिया है कि यहां जंगल सिर्फ पेड़ों का नहीं, बल्कि सवालों और जवाबदेही का भी फैल चुका है।


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