बैकुंठपुर। स्व. श्री रामधनी गुप्ता ‘गुल्लू भईया’ की स्मृति में प्रेमाबाग परिसर में आयोजित अखिल भारतीय पुरुष एवं महिला कुश्ती प्रतियोगिता के दूसरे दिन रविवार को ऐतिहासिक भीड़ देखने को मिली। दोपहर से ही दर्शकों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया और शाम होते-होते प्रेमाबाग परिसर में पैर रखने तक की जगह मुश्किल नजर आई। कुश्ती के मुकाबले देखने उमड़े दर्शकों की संख्या देखकर ऐसा लगा मानो आयोजन स्थल भी छोटा पड़ गया हो। हर उम्र के लोग अखाड़े के आसपास खड़े होकर पहलवानों के दांव-पेंच देखने के लिए उत्साहित नजर आए।
आयोजक सीए प्रशांत गुप्ता ने भी शायद नहीं सोचा था कि बैकुंठपुर में कुश्ती को लेकर इतनी बड़ी संख्या में दर्शक उमड़ेंगे। अपने पिता स्व. रामधनी गुप्ता की स्मृति में हर वर्ष अलग-अलग भव्य कार्यक्रम आयोजित करते आ रहे प्रशांत गुप्ता ने इस बार पहली बार कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन किया। पहली ही कोशिश में प्रतियोगिता को जिस तरह दर्शकों का समर्थन मिला, उससे आयोजन की सफलता का अंदाजा लगाया जा सकता है। अखाड़े में एक के बाद एक मुकाबले होते रहे और दर्शकों की तालियों एवं उत्साह से पूरा प्रेमाबाग परिसर गूंजता रहा।
बैकुंठपुर की कुश्ती का रहा है पुराना इतिहास
कुश्ती बैकुंठपुर के लिए कोई नया खेल नहीं है। शहर में कुश्ती की एक पुरानी और समृद्ध परंपरा रही है। स्थानीय लोगों के मुताबिक करीब 50 वर्षों तक नागपंचमी के अवसर पर बैकुंठपुर में कुश्ती प्रतियोगिता आयोजित होती रही। उस दौर में शहर के घड़ी चौक स्थित बाल मंदिर प्रांगण में अखाड़ा सजता था। कुश्ती देखने के लिए शहर ही नहीं, बल्कि आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते थे।
उस समय दूर-दराज के इलाकों से नामी पहलवान बैकुंठपुर पहुंचते थे और स्थानीय पहलवान भी अखाड़े में उतरकर बाहरी पहलवानों को चुनौती दिया करते थे। कई स्थानीय पहलवानों ने बड़े और दिग्गज पहलवानों को शिकस्त देकर बैकुंठपुर के अखाड़े की पहचान बनाई थी। नागपंचमी के दिन कुश्ती केवल खेल नहीं, बल्कि शहर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा हुआ करती थी। अखाड़े के आसपास लगने वाली भीड़, पहलवानों के दांव-पेंच और दर्शकों का उत्साह उस दौर की खास पहचान थी।
समय के साथ बदली तस्वीर
समय के साथ बैकुंठपुर की वह पुरानी कुश्ती परंपरा धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई। अखाड़े सिमट गए और स्थानीय स्तर पर कुश्ती में युवाओं की भागीदारी भी पहले जैसी नहीं रही। हालांकि रविवार को प्रेमाबाग में उमड़ी भीड़ ने यह जरूर बता दिया कि बैकुंठपुर में कुश्ती के प्रति लोगों का जुनून आज भी जिंदा है।
दिलचस्प बात यह रही कि ऐतिहासिक भीड़ के बीच दूर-दराज से आए पहलवानों ने अखाड़े में अपना दमखम दिखाया, लेकिन बैकुंठपुर के किसी स्थानीय पहलवान ने अखाड़े में उतरकर बाहरी पहलवानों को चुनौती नहीं दी। दर्शकों के बीच इसे लेकर चर्चा भी रही कि जिस शहर की पहचान कभी अपने पहलवानों और अखाड़ों से हुआ करती थी, वहां अब स्थानीय पहलवानों की मौजूदगी क्यों नजर नहीं आ रही है।
दर्शकों ने दिया आयोजन को समर्थन
दो दिवसीय प्रतियोगिता में पुरुष एवं महिला पहलवानों के बीच हुए मुकाबलों ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया। दूसरे दिन उमड़ी भीड़ पहले दिन की तुलना में कहीं अधिक नजर आई। परिवारों के साथ लोग कुश्ती देखने पहुंचे और बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में मुकाबलों को लेकर उत्सुकता दिखाई दी। पहलवानों के हर जोरदार दांव पर दर्शकों की तालियां गूंजती रहीं।
पहली बार कुश्ती प्रतियोगिता आयोजित करने वाले सीए प्रशांत गुप्ता के लिए दर्शकों का यह समर्थन खास मायने रखता है। पिता स्व. रामधनी गुप्ता की स्मृति में वर्षों से कार्यक्रम आयोजित करने की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इस बार उन्होंने बैकुंठपुर की पुरानी कुश्ती संस्कृति को फिर से मंच देने का प्रयास किया। प्रतियोगिता की सफलता ने यह संकेत जरूर दिया है कि यदि शहर में कुश्ती को नियमित मंच मिले और स्थानीय प्रतिभाओं को प्रोत्साहन दिया जाए, तो बैकुंठपुर की पुरानी अखाड़ा संस्कृति को फिर से जीवित किया जा सकता है।




