तीन दिन से बंद शहरी रेलवे आरक्षण केंद्र, टिकट दलाली के आरोपों ने खड़े किए सवाल

Chandrakant Pargir

 


बैकुंठपुर। कोरिया जिला मुख्यालय बैकुंठपुर स्थित शहरी रेलवे आरक्षण केंद्र पिछले तीन दिनों से बंद है। इसके चलते प्रतिदिन रेलवे टिकट आरक्षित कराने पहुंच रहे लोगों को बैकुंठपुर रोड (चरचा) रेलवे स्टेशन स्थित आरक्षण केंद्र का रुख करना पड़ रहा है। केंद्र के बंद होने के पीछे यहां पदस्थ कंप्यूटर ऑपरेटर से आरपीएफ द्वारा की जा रही पूछताछ को कारण बताया जा रहा है। आरोप है कि बैकुंठपुर के आरक्षण केंद्र से बनारस से मुंबई सहित दूसरे शहरों के लिए टिकट बनाए गए हैं। हालांकि पूरे मामले में रेलवे अथवा आरपीएफ की आधिकारिक जांच रिपोर्ट सामने आना बाकी है।


स्थानीय आरक्षण केंद्रों से दूसरे शहरों के टिकट बनाने का खेल?

स्थानीय लोगों का आरोप है कि बैकुंठपुर ही नहीं, बल्कि चिरमिरी, मनेन्द्रगढ़, बैकुंठपुर रोड (चरचा), करंजी, बिश्रामपुर, अंबिकापुर, शिवप्रसाद नगर और सूरजपुर सहित सरगुजा संभाग के कई रेलवे आरक्षण केंद्रों पर लंबे समय से दूसरे शहरों के यात्रियों के लिए टिकट बनाए जाने का सिलसिला चल रहा है। दावा है कि यह गतिविधि पिछले 8 से 10 वर्षों से चल रही है और इसके लिए अलग-अलग स्तर पर गिरोह सक्रिय हैं।

बताया जाता है कि ऐसे गिरोहों के सदस्य सुबह से ही आरक्षण केंद्रों पर कतार में नंबर लगा देते हैं। इसके बाद दूसरे शहरों के यात्रियों के नाम से आरक्षण टिकट बनवाकर उन्हें बस या निजी वाहनों के माध्यम से संबंधित शहरों तक पहुंचाया जाता है। खासकर बनारस जाने वाले यात्रियों के लिए कोरिया-सूरजपुर-सरगुजा क्षेत्र के आरक्षण केंद्रों से टिकट बनवाने की चर्चा लंबे समय से होती रही है। शाम की बसों के जरिए टिकट दूसरे शहरों तक पहुंचाने की बात भी सामने आती रही है।


टिकट यात्री तक पहुंचाना क्यों जरूरी?

रेलवे आरक्षण केंद्र से जारी मूल टिकट को लेकर यात्रियों में विशेष मांग रहती है। ऐसे में टिकट बनवाने वाले व्यक्ति को मूल टिकट संबंधित यात्री तक पहुंचाया जाता है। यही वजह है कि स्थानीय आरक्षण केंद्रों से दूर-दराज के शहरों के लिए टिकट बनाने का कथित नेटवर्क सिर्फ टिकट बुक कराने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि टिकट को संबंधित यात्री तक पहुंचाने की व्यवस्था भी की जाती है।


आधार की जांच पर भी सवाल

रेलवे आरक्षण केंद्र स्थानीय यात्रियों को सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्थापित किए गए हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि दूर-दराज के शहरों के यात्रियों के लिए लगातार टिकट बनाए जा रहे हैं तो आरक्षण केंद्रों पर टिकट बनाते समय पहचान संबंधी दस्तावेजों की जांच किस स्तर पर की जाती है? स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी व्यवस्था में स्थानीय निवासियों को प्राथमिकता अथवा पहचान सत्यापन का प्रावधान है तो उसका पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

हालांकि, रेलवे के आरक्षण नियमों और पहचान संबंधी प्रावधानों के तहत वास्तव में कौन-कौन से दस्तावेज आवश्यक हैं तथा दूसरे शहर के यात्री के टिकट पर क्या प्रतिबंध लागू हैं, इसकी आधिकारिक स्थिति रेलवे से स्पष्ट होना जरूरी है। इसलिए पूरे मामले में जांच के बाद ही यह तय हो सकेगा कि संबंधित केंद्रों पर नियमों का उल्लंघन हुआ है या नहीं।


तीन दिन से ताला, नगर पालिका की भूमिका पर भी सवाल

बैकुंठपुर के शहरी रेलवे आरक्षण केंद्र के संचालन और व्यवस्थाओं में नगर पालिका प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। तीन दिन से केंद्र बंद होने के बावजूद यात्रियों की परेशानी दूर करने के लिए अब तक कोई ठोस पहल नजर नहीं आई है। टिकट बनवाने पहुंचे लोग केंद्र पर ताला देखकर वापस लौट रहे हैं और उन्हें बैकुंठपुर रोड रेलवे स्टेशन तक जाना पड़ रहा है।

स्थानीय स्तर पर इस आरक्षण केंद्र की अव्यवस्थाओं को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। अब टिकट बनाए जाने के कथित मामले के बाद केंद्र बंद होने से यह पूरा प्रकरण और गंभीर हो गया है। जरूरत इस बात की है कि रेलवे और आरपीएफ पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करें, यह पता लगाएं कि दूसरे शहरों के टिकट स्थानीय केंद्रों से किस स्तर पर और किस नेटवर्क के जरिए बनाए जा रहे थे तथा यदि नियमों का उल्लंघन मिला तो जिम्मेदारी तय की जाए।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि यह व्यवस्था वर्षों से चल रही थी, तो रेलवे के जिम्मेदार अधिकारियों की नजर इस कथित टिकट नेटवर्क पर पहले क्यों नहीं पड़ी?

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