मनेन्द्रगढ़ (एमसीबी)। मनेन्द्रगढ़ वन मंडल एक बार फिर गंभीर विवादों के घेरे में आ गया है। डीएफओ द्वारा विभिन्न परिक्षेत्रों में मनमर्जी से की गई नियुक्तियों के बाद अब राज्य सरकार के आदेशों की कथित अवहेलना और भ्रष्टाचार को संरक्षण देने के आरोप सामने आ रहे हैं। कुंवरपुर परिक्षेत्र में भूपेंद्र यादव को डिप्टी, केल्हारी में रघुराज सिंह को डिप्टी और खड़गवां परिक्षेत्र में शंखमुनि पांडेय की नियुक्ति को लेकर पहले ही सवाल उठ चुके थे। बढ़ते विवाद के बाद सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा और इन पदों पर प्रशिक्षु अधिकारियों की नियुक्ति की गई।
हालांकि अब जो तथ्य सामने आए हैं, वे और भी गंभीर हैं। जानकारी के अनुसार जिन प्रशिक्षु अधिकारियों को परिक्षेत्राधिकारी नियुक्त किया गया है, उन्हें अब तक वास्तविक प्रभार नहीं दिया गया है, जबकि प्रभार देने का स्पष्ट आदेश राज्य सरकार द्वारा जारी किया जा चुका है। इसके बावजूद उन्हें इधर-उधर बैठाकर, केवल निरीक्षण के नाम पर परिक्षेत्र से दूर रखा जा रहा है। सूत्रों का दावा है कि विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा उन्हें एक माह बाद प्रभार देने के निर्देश दिए गए हैं।
दरअसल, वर्तमान समय में मनेन्द्रगढ़ वन मंडल के विभिन्न परिक्षेत्रों में भू-जल संरक्षण के कार्य चल रहे हैं। आरोप है कि इन कार्यों में वास्तविक रूप से केवल 20 से 30 प्रतिशत कार्य ही धरातल पर होता है, जबकि शेष राशि कागजों में निकालकर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दी जाती है। जानकारों का कहना है कि यदि प्रशिक्षु अधिकारियों को तत्काल प्रभार दे दिया जाता है, तो इन कार्यों की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है, जिससे सीधे-सीधे कुछ अधिकारियों की जेब पर असर पड़ेगा। यही वजह बताई जा रही है कि जानबूझकर उन्हें प्रभार से दूर रखा जा रहा है।
यह मामला इसलिए भी अधिक गंभीर हो जाता है क्योंकि राज्य सरकार के स्पष्ट आदेश के बावजूद प्रभार नहीं दिया जाना सीधे तौर पर आदेशों की अवहेलना माना जा रहा है। यही नहीं, राज्य सरकार के निर्देशों की अनदेखी से जुड़ा एक अन्य मामला पहले से ही हाई कोर्ट में लंबित है, जिसमें डीएफओ के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही चल रही है। कानूनी जानकारों का मानना है कि इस प्रकरण में उन्हें माननीय न्यायालय के समक्ष माफी मांगनी पड़ सकती है, या फिर अदालत कोई कड़ा कदम भी उठा सकती है।
लगातार सामने आ रहे इन मामलों ने मनेन्द्रगढ़ वन मंडल की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। एक ओर जहां सरकार प्रशिक्षु अधिकारियों की नियुक्ति कर व्यवस्था सुधारने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर उन्हीं अधिकारियों को अधिकार विहीन रखकर पुराने ढर्रे को बनाए रखने की कोशिशें उजागर हो रही हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन इस पूरे मामले में वास्तविक कार्रवाई करता है या फिर यह मामला भी फाइलों और अदालतों के बीच उलझकर रह जाएगा।

