बिलासपुर। मध्यप्रदेश–छत्तीसगढ़ के जाने-माने वन्यजीव विशेषज्ञ प्राण चड्ढा ने छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में सामने आए टाइगर शिकार मामले को लेकर वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने इस संबंध में अपने फेसबुक पोस्ट के माध्यम से वन विभाग की मानसिकता और कार्यशैली पर तीखी टिप्पणी की है।
प्राण चड्ढा ने जिस तस्वीर को साझा किया है, उसमें इस सप्ताह सूरजपुर में पकड़े गए कथित टाइगर शिकारियों को जप्ती के माल के साथ जमीन पर बैठा हुआ दिखाया गया है, जबकि पीछे वन विभाग के अधिकारी और अमला कुर्सियों पर बैठे नजर आ रहे हैं। इस तस्वीर में कुल मिलाकर एक दर्जन से अधिक वनकर्मी दिखाई दे रहे हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि जिस विभाग को टाइगर संरक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई है, उसे शिकार की घटना के दो-तीन दिन तक इसकी भनक तक नहीं लगी। मामले के उजागर होने के बाद अब वही अमला गर्व के साथ फोटो खिंचवाता नजर आ रहा है। चड्ढा ने कहा कि यदि टाइगर के जीवित रहते समय सूचना या टोह के आधार पर शिकारी रंगे हाथ पकड़े जाते, तब ऐसी तस्वीरें प्रशंसनीय होतीं, लेकिन यहां तो टाइगर की जान चली गई और विभाग की ‘कामयाबी’ की तस्वीरें मीडिया में प्रकाशित हो गईं।
वन्यजीव विशेषज्ञ ने यह भी कहा कि वन विभाग इसके लिए वेतन प्राप्त करता है और आधी-अधूरी सफलता पर इस तरह का प्रदर्शन उचित नहीं है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि अन्य विभागों के कर वसूली जैसे अमले ने बहुत पहले इस तरह की फोटोबाजी और मानसिकता को छोड़ दिया है, लेकिन वन विभाग अब भी इससे बाहर नहीं आ पाया है।
प्राण चड्ढा ने कई अहम सवाल भी उठाए हैं—मारा गया टाइगर किस क्षेत्र का था, वह किस दिशा से सूरजपुर इलाके में आया, और क्या वन विभाग को उसके मूवमेंट की कोई पूर्व जानकारी थी या नहीं। इन सवालों के जवाब अब भी सार्वजनिक नहीं हुए हैं।
इस पोस्ट के बाद वन विभाग की कार्यप्रणाली और टाइगर संरक्षण को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। विशेषज्ञों और जागरूक नागरिकों का मानना है कि इस तरह की घटनाओं से सबक लेकर वन विभाग को अपनी निगरानी व्यवस्था और जिम्मेदारियों में सुधार करना चाहिए, ताकि भविष्य में किसी और टाइगर की जान न जाए।


