सरगुजा संभाग के दौरे पर पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का स्वागत इस बार उतना गर्मजोशी भरा नहीं दिखा, जितनी सियासी तपिश की उम्मीद थी। अम्बिकापुर में टीएस समर्थक और पैलेस समर्थक ऐसे नदारद रहे मानो कोई “नो एंट्री” बोर्ड लग गया हो। कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं ने भी सुरक्षित दूरी बनाए रखी—न सामने आए, न माला लेकर मुस्कुराए। लगता है, स्वागत से ज्यादा “स्थिति का आकलन” चल रहा था।
कोरिया में भी दृश्य कुछ अलग नहीं रहा। टीएस समर्थक गायब थे और पूर्व विधायक अम्बिका सिंहदेव की अनुपस्थिति ने सवालों को और हवा दे दी। महंत समर्थक जरूर पूर्व मुख्यमंत्री से मिले, लेकिन कैमरे से दूरी बनाए रखते हुए—मानो मिलना जरूरी था, दिखना नहीं। वहीं कुड़ेली में वेदांती समर्थकों ने पूरे उत्साह से भव्य स्वागत कर दिया। दिलचस्प यह कि मुख्यमंत्री रहते भूपेश बघेल कभी वेदांती तिवारी के घर नहीं पहुंचे थे, लेकिन अब कांग्रेसी नेता वहां पहुंचते दिखे—राजनीति में वक्त के साथ रिश्ते भी बदल जाते हैं।
कोरिया जिले के विभाजन के बाद भूपेश बघेल पहली बार जिला मुख्यालय बैकुंठपुर पहुंचे। मुख्यमंत्री रहते दो बार आना और अब विपक्ष में आकर फिर पहुंचना—इस बीच जिले का मिजाज काफी बदल चुका है। विभाजन को लेकर लोगों में पहले जैसी ही नाराजगी आज भी कायम है, जिसका असर विधानसभा चुनाव में साफ दिखा, जहां कांग्रेस को तीनों सीटों पर करारी हार मिली। तब विभाजन के मुद्दे पर भूपेश बघेल की “जिद” के चलते कांग्रेस, भाजपा और जिले के गणमान्य नागरिकों को तिरस्कार झेलना पड़ा था। हैरानी की बात यह रही कि उसी प्रतिनिधिमंडल में शामिल कुछ चेहरे, जो कभी इस विभाजन को अन्यायपूर्ण बताते थे, इस बार स्वागत करते नजर आए। राजनीति है जनाब—यहां विरोध भी वक्त देखकर मुस्कान में बदल जाता है।




