पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने से नहीं बच सकतीं कंपनियां: सुप्रीम कोर्ट, सीएसआर फंड कोई दान नहीं, वैधानिक दायित्व है

Chandrakant Pargir

 


नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली कॉरपोरेट कंपनियां अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। अदालत ने कहा कि कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) को कॉरपोरेट पर्यावरणीय जिम्मेदारी से अलग करके नहीं देखा जा सकता। कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत सीएसआर कोई स्वैच्छिक दान नहीं, बल्कि एक वैधानिक और लागू करने योग्य दायित्व है।

संकटग्रस्त ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के संरक्षण से जुड़े मामले में फैसला सुनाते हुए जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने कहा कि कंपनियां केवल कानूनी व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज का अहम हिस्सा हैं। इस कारण उन पर संविधान के तहत पर्यावरण, वन्यजीवों और जीव-जंतुओं के प्रति करुणा दिखाने का मौलिक कर्तव्य लागू होता है।

पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि जहां कॉरपोरेट गतिविधियों से प्राकृतिक आवास नष्ट होते हैं या संकटग्रस्त प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में पड़ता है, वहां ‘प्रदूषण भुगतान सिद्धांत’ और ‘प्रजाति के सर्वोत्तम हित’ के आधार पर संरक्षण का दायित्व स्वतः लागू हो जाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सीएसआर फंड को परोपकार या दान का साधन मानना गलत है, बल्कि यह संविधान और न्यासीय जिम्मेदारियों के निर्वहन का माध्यम है, खासकर उन परिस्थितियों में जहां कॉरपोरेट गतिविधियों से पर्यावरण और जैव विविधता को खतरा होता है।

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