बैकुंठपुर। अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत विशेष न्यायालय, बैकुंठपुर, जिला कोरिया के विशेष न्यायाधीश श्री आशीष पाठक ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए आरोपी मजहर खान को दोषी करार दिया है। न्यायालय ने आरोपी को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 294, 341, 506 एवं अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(द), 3(1)(घ), 3(2)(क) के तहत विभिन्न धाराओं में कारावास एवं अर्थदण्ड से दण्डित किया है।
प्रकरण के अनुसार, प्रार्थिया चम्पाकली दिवाकर, जो उस समय खाद्य निरीक्षक के पद पर बैकुंठपुर में पदस्थ थीं, दिनांक 19 जुलाई 2020 को ग्राम खरवत में शासकीय उचित मूल्य की दुकान का निरीक्षण करने गई थीं। निरीक्षण उपरांत जब वे शाम लगभग 5 बजे खरवत रेलवे पुल के पास पहुँचीं, तभी अभियुक्त मजहर खान अपने एक साथी के साथ स्प्लेंडर मोटरसाइकिल में पहुँचा और प्रार्थिया का रास्ता रोक लिया।
आरोपी ने प्रार्थिया को जातिसूचक शब्दों से अपमानित करते हुए गालियाँ दीं और उनके खिलाफ चल रहे प्रकरण को वापस लेने व उच्च न्यायालय में जमानत का विरोध न करने का दबाव बनाया। प्रार्थिया द्वारा मना करने पर आरोपी ने जान से मारने, बच्चों को गायब करने और नौकरी खत्म करवाने की धमकी दी।
घटना की लिखित शिकायत पर थाना अजाक बैकुंठपुर में अपराध क्रमांक 26/2020 पंजीबद्ध किया गया था, जिसमें आरोपी पर धारा 294, 341, 506, 509, 34 भा.दं.सं. एवं धारा 3(1)(द), 3(1)(घ), 3(2)(क) अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के तहत मामला दर्ज हुआ।
फैसले में न्यायालय ने अभियुक्त मजहर खान को धारा 294 व 341 भा.दं.सं. के तहत 500-500 रुपये का अर्थदण्ड, धारा 506 भा.दं.सं. के तहत 6 माह का सश्रम कारावास एवं 500 रुपये अर्थदण्ड, तथा अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराओं 3(1)(द), 3(1)(घ), 3(2)(क) के तहत क्रमशः 6-6-6 माह का सश्रम कारावास एवं 500-500-500 रुपये अर्थदण्ड से दण्डित किया है।
मामले की पैरवी शासन की ओर से विशेष लोक अभियोजक द्वारा की गई। उन्होंने अपने तर्कों में कहा कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के प्रति बढ़ते अत्याचार को देखते हुए ऐसे अपराध क्षम्य नहीं हैं। उन्होंने न्यायालय को बताया कि आज भी समाज के इन वर्गों को भेदभाव, अपमान एवं उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, और ऐसे अपराधों पर कड़ी न्यायिक कार्रवाई आवश्यक है ताकि समाज में न्याय और समानता का संदेश जाए।
यह फैसला समाज में जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न के विरुद्ध न्यायिक दृढ़ता का प्रतीक माना जा रहा है।

