मनेन्द्रगढ़। छत्तीसगढ़ वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा डीएफओ मनीष कश्यप के निलंबन के बाद मनेन्द्रगढ़ वन मंडल में प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, निलंबन की खबर सामने आते ही पूरे वन मंडल में एक तरह का सन्नाटा छा गया है। रेंजर स्तर से लेकर निचले कर्मचारियों तक में असहजता का माहौल बताया जा रहा है। चर्चा यह भी है कि पहले उनके तबादले की अटकलें लगती रहीं, लेकिन मजबूत राजनीतिक पकड़ के कारण कार्रवाई टलती रही। परंतु अब कार्यवाही ऐसी हुई है कि भाजपा सरकार रहते वापसी की संभावना न के बराबर लग रही है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
स्थानीय स्तर पर उनकी कार्यशैली को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। कुछ सूत्रों का कहना है कि विभागीय निर्णयों में कई बार वरिष्ठ अधिकारियों की सलाह को नजरअंदाज किया गया। वहीं आरटीआई के तहत भुगतान और वाउचर संबंधी जानकारी देने में कथित रूप से रोक लगाए जाने की बातें भी सामने आई थीं। इस मामले में विभाग की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया अब तक नहीं आई है, लेकिन निलंबन के बाद इन मुद्दों की फिर चर्चा तेज हो गई है।
भाषा शैली से नाराजगी
डीएफओ की भाषा शैली को लेकर न सिर्फ कर्मचारियों में बल्कि नेताओ में भी नाराजगी देखी जा चुकी है, हाल में ही भाजपा के नेताओ ने उनकी भाषा की शैली से छुब्ध होकर वन मंडल कार्यालय के सामने धरना दे दिया था, यही एक कारण था कि जब कोरिया वन मण्डल में पदस्थ थे तो वह कर्मचारियों ने 11 दिन आंदोलन किया था। कांग्रेस सरकार में तत्कालीन मुख्यमंत्री के सामने उनके जवाब से नाराज होकर उन्होंने उन्हें निलंबित लर दिया था।
कुछ परिक्षेत्रों में वित्तीय अनियमितताओं की चर्चा
वन मंडल के बिहारपुर, केल्हारी, बहरासी और मनेन्द्रगढ़ परिक्षेत्र को लेकर भी समय-समय पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगते रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक बिहारपुर परिक्षेत्र के एक कर्मचारी को अत्यधिक अधिकार दिए जाने से विभागीय प्रक्रिया प्रभावित हुई और कई निर्णय उसी के माध्यम से संचालित होने लगे। अब इन परिक्षेत्रों के खातों और भुगतानों की विस्तृत जांच की मांग तेज हो रही है, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
मैदानी कार्यों और योजनाओं पर भी उठे सवाल
कुछ कर्मचारियों और स्थानीय लोगों का दावा है कि कई विकास एवं संरक्षण कार्यों में कागजी प्रगति ज्यादा दिखाई गई, जबकि मौके पर काम अपेक्षाकृत कम नजर आया। इसके अलावा “महुआ बचाओ” जैसी योजनाओं में खर्च और भुगतान की पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। आरोप है कि वन सुरक्षा समितियों को पर्याप्त जानकारी दिए बिना लाखों रुपये खर्च किए गए, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
फिलहाल डीएफओ मनीष कश्यप के निलंबन के बाद विभागीय जांच की संभावनाओं को लेकर चर्चाएं तेज हैं। यदि जांच होती है तो इससे वन मंडल में चल रही गतिविधियों और आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। विभागीय हलकों के साथ-साथ स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों की नजर अब आगे की कार्रवाई पर टिकी हुई है।

